राम रावण युद्ध उपरान्त भगवान राम को विजय हासिल होता है । वे लंका से अयोध्या वापिस लौटते हैं। उनके साथ में उनकी सेना में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले साथी सुग्रीव, विभीषण, हनुमान, बाली पुत्र अंगद, जामवंत , नल , नील और वानर सेना भी अयोध्या लौटते हैं । अयोध्या आकर भगवान राम की शरण में वे सभी इतने बेसुध हो जाते हैं कि उन्हें घर की याद भी नहीं रह जाती । देखा जाए तो उन्हें राम के साथ यहाँ रहना बहुत पसंद आता है और वे अयोध्या से वापस लौटना ही नहीं चाहते । पर यह कहाँ संभव है कि कोई हमेशा के लिए अपना घर छोड़कर किसी दूसरे के घर रह जाए । राम का साथ देते हुए अपनी अपनी भूमिका खत्म कर लेने के बाद सबको अपने जीवन की भूमिका में तो लौटना ही पडेगा । राम सबकी भावनाओं को समझते भी हैं पर घर परिवार की व्यवस्था को चलाने के लिए वे उन्हें वहां से ससम्मान विदा भी करने की सोचते हैं।
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| अंगद का राम के प्रति प्रेम |
राम का राज्य अभिषेक भी हो जाता है । छः माह बीत जाने के बाद राम ही एक दिन अपने सभी सिपहसालारों के लिए वस्त्र और आभूषण मंगाते हैं ।सबको एक एक कर बारी-बारी से अंग वस्त्र और आभूषण पहनाने का क्रम शुरू होता है । इसी के साथ उनकी विदाई का क्रम आरम्भ होता है । इन विदाई के दृश्यों को रामायण की चौपाईयों/दोहों में बड़े मार्मिक ढंग से चित्रित किया गया है ।
विदाई के इस क्रम में सबसे पहले सुग्रीव की
बारी आती है -
तब प्रभु भूषन
बसन मगाए। नाना रंग अनूप सुहाए॥
सुग्रीवहि
प्रथमहिं पहिराए। बसन भरत निज हाथ बनाए॥
भावार्थ: तब प्रभु ने अनेक रंगों के अनुपम और
सुंदर गहने-कपड़े मंगवाए।
सबसे पहले भरत जी ने अपने हाथों से सँवारकर
सुग्रीव को वस्त्र आभूषण पहनाए॥
विदाई के अगले क्रम में विभीषण की बारी आती
है-
प्रभु प्रेरित
लछिमन पहिराए। लंकापति रघुपति मन भाए॥
अंगद बैठ रहा
नहिं डोला। प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला॥
भावार्थ: फिर प्रभु की प्रेरणा से लक्ष्मण जी
ने विभीषण जी को गहने-कपड़े पहनाए, जो
श्री रघुनाथ जी के मन को बहुत ही अच्छे लगे। अंगद बैठे ही रहे, वे अपनी जगह से हिले तक नहीं। उनका
उत्कट प्रेम देखकर प्रभु ने उनको नहीं बुलाया॥
जामवंत नीलादि
सब पहिराए रघुनाथ।
हियँ धरि राम
रूप सब चले नाइ पद माथ॥
भावार्थ: जाम्बवान और नील आदि सबको श्री
रघुनाथजी ने स्वयं भूषण-वस्त्र पहनाए। वे सब अपने अपने हृदय में श्री रामचंद्र जी
के रूप को धारण करके उनके चरणों में मस्तक नवाकर जाने लगे ॥
सबको विदा कर लेने के बाद में सबसे अंत में अंगद की विदाई को लेकर रामायण में जो प्रसंग आता है , उसकी मार्मिकता हमें भीतर से असहज करने लगती है| अंगद का राम के साथ जो संवाद है, उसे आप भी देखें और महसूस करें -
तब अंगद उठि नाइ
सिरु सजल नयन कर जोरि।
अति बिनीत बोलेउ
बचन मनहुँ प्रेम रसबोरि॥
भावार्थ: तब अंगद उठकर सिर नवाकर, नेत्रों में जल भरकर और हाथ जोड़कर
अत्यंत विनम्र तथा मानो प्रेम के रस में अपने को डुबोए हुए मधुर वचन बोले॥
सुनु सर्बग्य
कृपा सुख सिंधो। दीन दयाकर आरत बंधो॥
मरती बेर नाथ
मोहि बाली। गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली॥
भावार्थ: हे सर्वज्ञ! हे कृपा और सुख के
समुद्र! हे दीनों पर दया करने वाले! हे आर्तों के बंधु! सुनिए ! हे नाथ ! मरते समय
मेरे पिता बाली ने मुझे आपकी ही गोद में डालकर आपको सौंप दिया था ॥
असरन सरन बिरदु
संभारी। मोहि जनि तजहु भगत हितकारी॥
मोरें तुम्ह
प्रभु गुर पितु माता। जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता॥
भावार्थ: अतः हे भक्तों के हितकारी! अपना
अशरण-शरण विरद (बाना) याद करके मुझे त्यागिए नहीं। मेरे तो स्वामी, गुरु, पिता और माता सब कुछ आप ही हैं। आपके चरण कमलों को छोड़कर मैं अब कहाँ
जाऊँ?॥
तुम्हहि बिचारि
कहहु नरनाहा। प्रभु तजि भवन काज मम काहा॥
बालक ग्यान
बुद्धि बल हीना। राखहु सरन नाथ जन दीना॥
भावार्थ: हे महाराज! आप ही विचार कर कहिए, प्रभु आपको छोड़कर घर में मेरा अब क्या
काम है? हे नाथ! इस ज्ञान, बुद्धि और बल से हीन बालक तथा दीन हीं सेवक
को अपनी शरण में रखिए॥
नीचि टहल गृह कै
सब करिहउँ। पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ॥
अस कहि चरन परेउ
प्रभु पाही। अब जनि नाथ कहहु गृह जाही॥
भावार्थ: मैं घर का छोटा से छोटा काम करके सेवा
करूँगा और आपके चरण कमलों को देख-देखकर भवसागर से तर जाऊँगा। ऐसा कहकर अंगद श्रीराम जी के चरणों में गिर पड़े और बोले- 'हे प्रभु
! मेरी रक्षा कीजिए। हे नाथ! अब यह न कहिए कि तू अपने घर जा॥
अंगद बचन बिनीत
सुनि रघुपति करुना सींव।
प्रभु उठाइ उर
लायउ सजल नयन राजीव॥
भावार्थ: अंगद के विनम्र वचन सुनकर करुणा के
समुद्र प्रभु श्री रघुनाथ जी ने उनको उठाकर हृदय से लगा लिया। प्रभु के नेत्र
कमलों में प्रेमाश्रुओं का जल भर आया॥
निज उर माल बसन
मनि बालितनय पहिराइ।
बिदा कीन्हि
भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ॥
भावार्थ: तब भगवान ने अपने हृदय की माला, वस्त्र और मणि (रत्नों के आभूषण) बालि
पुत्र अंगद को पहनाकर और बहुत प्रकार से समझा बुझाकर उनकी विदाई की॥
भरत अनुज सौमित्रि समेता। पठवन चले भगत कृत चेता॥
अंगद हृदयँ
प्रेम नहिं थोरा। फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा॥
भावार्थ: भक्तों के अमूल्य योगदान को याद करके
भरत जी, उनके छोटे भाई शत्रुघ्न जी और लक्ष्मण जी सभी उनको पहुँचाने गए । राम के
प्रति अंगद के हृदय में बहुत अधिक प्रेम है। वे पीछे मुड़ मुड़ श्रीराम जी की ओर
देखते हैं॥
बार बार कर दंड
प्रनामा। मन अस रहन कहहिं मोहि रामा॥
राम बिलोकनि बोलनि चलनी। सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी॥
भावार्थ: अंगद बार-बार दण्डवत प्रणाम करते हैं। उनके मन में ऐसे विचार आते हैं कि श्रीराम जी मुझे अपने साथ रहने को कह दें। वे श्रीराम जी के देखने की, बोलने की, चलने की तथा हँसकर मिलने की रीति को याद कर-करके दुःखी होते हैं।
भावुक परिस्थितियों के बाद भी राम अंगद को जाने से रोकते नहीं हैं। उनकी दूरदर्शिता उन्हें ऐसा करने से उन्हें रोकती है । दुनिया की व्यवस्था को चलाने के लिए अंगद का जाना जरूरी है राम इस बात को समझते हैं। अंततः अंगद सहित सबको अयोध्या से विदा करके भरत एवं उनके भाई लौट आते हैं । अंगद की अयोध्या से विदाई इसलिए भी जरूरी है क्योंकि अंगद किष्किन्धा के युवराज थे और उन्हें आगे चलकर वहां का राजपाट संभालना था । दुनियादारी की व्यव्स्था को बिगाड़ा नहीं जा सकता, इस बात को राम से अधिक कौन जान सकता है। इसलिए राम ने अंगद को जाने से नहीं रोका । यद्यपि यहाँ अंगद की विदाई के दृश्य हमें भावुक करते हैं , पर दुनिया की सत्यता और वस्तुस्थितियों की ओर भी हमें यहाँ नज़र डालनी पड़ती है।
-प्रतिमा शर्मा
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